Tuesday, 6 September 2011

कैसा आलम


मेरी ही आँखें आंसू बहाती हैं और ,
मेरे ही गाल उनको बहा देते हैं,
मेरे ही अपने देते हैं घाव मुझे
मेरे ही ज़ख्म मरहम लगा लेते हैं ,

साथ माँगू किसी से ,गवारा नहीं
मेरा साहिल या कोई किनारा नहीं
बहुत मुश्किलें आई हैं बनके मेहमां
मेरी गैरत ने दामन पसारा  नहीं

क्यों नहीं है यहाँ मेरे जैसा कोई
या बनी मैं नहीं इस जहाँ के लिये
आग में जलके जैसे दमकता है कुंदन
मुझको भेजा गया इम्तहान के लिये

मेरे सपनो का कोई खारोंदा कभी
अपने संग में बहाती लहर ले गई
मैंने खुशियों का तोहोफा भी जिसको दिया
मुझे बदले में वो शय ज़हर दे गई

अब तो ऐसा है आलम मेरी रूह का
मेरी लोरी ही मुझको सुला देती है
मेरे सपने ही देते हैं मुझको जगा
मेरी तन्हाई महफ़िल सजा देती है

आके गम मेरा मुझको हँसाता कभी
आके बरसात मुझको जला देती है ........

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